मैं
फिरता रहूँ बादलों की तरह बेफ़िक्र
ऐसी फ़ितरत हो ये आरज़ू है
बैरागन जुड़ा रहूँ ज़मीन से फिर भी
ऐसी सोहबत मिले ये जुस्तजू है
घडी का काँटा आगे बढ़ रहा हैं
अस्तित्व की शायद यहीं पराकाष्ठा है
मैं बदलता साज़ हूँ सचेत
गर हूँ माध्यम या रचनाकार
- कोविद
फिरता रहूँ बादलों की तरह बेफ़िक्र
ऐसी फ़ितरत हो ये आरज़ू है
बैरागन जुड़ा रहूँ ज़मीन से फिर भी
ऐसी सोहबत मिले ये जुस्तजू है
घडी का काँटा आगे बढ़ रहा हैं
अस्तित्व की शायद यहीं पराकाष्ठा है
मैं बदलता साज़ हूँ सचेत
गर हूँ माध्यम या रचनाकार
- कोविद
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